जनवरी 2026 में दावोस (वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित ‘Board of peace'(‘बोर्ड ऑफ़ पीस’) इस समय वैश्विक राजनीति का सबसे चर्चित और विवादित विषय बना हुआ है।
‘Board of peace’ क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस 2026 के मंच से एक ऐसा दांव चला है जिसने 80 साल पुराने संयुक्त राष्ट्र (UN) के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं।शुरुआत में इसे ट्रंप की ‘गज़ा के लिए 20-सूत्रीय शांति योजना’ के हिस्से के रूप में प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य गज़ा के पुनर्निर्माण और प्रशासन की देखरेख करना था। हालांकि, अब ट्रंप इसे एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में पेश कर रहे हैं जो संयुक्त राष्ट्र (UN) की तर्ज पर दुनिया भर के संघर्षों को सुलझाने का दावा करता है।
‘Board of peace’ की संरचना और प्रमुख सदस्य
ट्रंप इस ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’(‘Board of peace’)के आजीवन अध्यक्ष (Chair for life) होंगे। बोर्ड को अलग-अलग स्तरों पर विभाजित किया गया है:
- संस्थापक कार्यकारी बोर्ड (Founding Executive Board): इसमें ट्रंप के करीबी और भरोसेमंद लोग शामिल हैं:
- मार्को रुबियो: अमेरिकी विदेश मंत्री।
- स्टीव विटकॉफ़: मध्य पूर्व के लिए विशेष दूत।
- जेरेड कुशनर: ट्रंप के दामाद और पूर्व सलाहकार।
- टोनी ब्लेयर: ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री।
- अजय बंगा: विश्व बैंक के अध्यक्ष।
- मार्क रोवन: अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के CEO।
- शामिल होने वाले देश: लगभग 19 देशों ने इसके चार्टर पर हस्ताक्षर किए हैं या सहमति जताई है, जिनमें शामिल हैं:
- प्रमुख देश: इसराइल, सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की, अर्जेंटीना, हंगरी, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), और पाकिस्तान।
- अन्य: मोरक्को, बहरीन, आर्मेनिया, अजरबैजान, कजाकिस्तान, वियतनाम।
- चीन और रूस: रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि वे निमंत्रण पर विचार
भारत का रुख
भारत को इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है, लेकिन भारत सरकार ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक सहमति नहीं दी है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ऐसी किसी संस्था का हिस्सा बनने में सावधानी बरतेगा जो संयुक्त राष्ट्र की महत्ता को कम करती हो या जिसकी संरचना पूरी तरह से पारदर्शी न हो।कर रहे हैं, जबकि चीन अब तक इससे दूर रहा है।
मुख्य विवाद: क्यों उठ रहे हैं सवाल?
बोर्ड को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी विरोध और चिंताएं हैं:
| विवाद का मुद्दा | विवरण |
| UN को चुनौती | आलोचकों का मानना है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की भूमिका को खत्म करने या उसके समानांतर एक ‘निजी क्लब’ चलाने की कोशिश है। ट्रंप ने खुद संकेत दिया है कि यह बोर्ड UN की जगह ले सकता है। |
| $1 अरब की सदस्यता फीस | Board of Peace की स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर (लगभग ₹8300 करोड़) की भारी भरकम राशि तय की गई है। इसे आलोचक “Pay to Play” (पैसे दो और सत्ता पाओ) मॉडल कह रहे हैं। |
| लोकतंत्र बनाम तानाशाही | ट्रंप ने स्वीकार किया है कि उन्होंने कुछ “विवादास्पद” नेताओं को आमंत्रित किया है क्योंकि उनके पास प्रभाव है। पश्चिमी देशों (जैसे फ्रांस, जर्मनी) का मानना है कि यह मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने वाले नेताओं को मंच देगा। |
| पारदर्शिता का अभाव | Board of Peace के फैसले लेने का अंतिम अधिकार केवल ट्रंप के पास होगा। यह अंतरराष्ट्रीय समानता (Sovereign Equality) के सिद्धांत के खिलाफ माना जा रहा है। |
सबसे बड़ा विवाद: क्या UN खत्म हो जाएगा?
आलोचकों और विश्व नेताओं की चिंता के तीन मुख्य कारण हैं:
- UN का विकल्प: ट्रंप ने खुद कहा है कि यह बोर्ड वह सब कर सकता है जो UN नहीं कर पाया। उन्होंने संकेत दिया कि यह भविष्य में UN की जगह ले सकता है।
- लोकतंत्र पर खतरा: बोर्ड में फैसले केवल ट्रंप की मर्जी से होंगे। इसमें ‘वीटो’ जैसा कोई लोकतांत्रिक सिस्टम नहीं, बल्कि एक व्यक्ति का कंट्रोल है।
- गज़ा का बहाना: आरोप है कि यह बोर्ड गज़ा के पुनर्निर्माण के नाम पर दुनिया की भू-राजनीति (Geopolitics) को अपने हिसाब से चलाने का एक जरिया है।
Read more : Tramp ka bada faisla : दक्षिण कोरिया पर टैरिफ बढ़ाकर 25% किया, ट्रेड डील में हुई देरी ,बनी मुख्य वजह
निष्कर्ष (Conclusion)
‘Board of peace'(‘बोर्ड ऑफ़ पीस’) अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नया प्रयोग है या फिर संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक बनाने की साजिश, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन एक बात साफ है—ट्रंप ने पैसे और पावर के दम पर दुनिया को दो गुटों में बांटने की शुरुआत कर दी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. ट्रंप के ‘Board of peace’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य गज़ा (Gaza) के पुनर्निर्माण और दुनिया भर के बड़े संघर्षों को सुलझाने के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करना है, जिसे ट्रंप संयुक्त राष्ट्र (UN) से ज्यादा प्रभावी मानते हैं।
Q2. इस बोर्ड की सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर की फीस क्यों रखी गई है?
उत्तर: ट्रंप के अनुसार, यह राशि गज़ा के पुनर्निर्माण और बोर्ड के संचालन के लिए एक कोष (Fund) के रूप में इस्तेमाल की जाएगी। हालांकि, आलोचक इसे अमीर देशों का एक ‘प्राइवेट क्लब’ बता रहे हैं।
Q3. क्या ‘Board of Peace’ संयुक्त राष्ट्र (UN) की जगह ले लेगा?
उत्तर: डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि यह बोर्ड UN के समानांतर काम करेगा और उन मुद्दों पर फैसले लेगा जहाँ UN विफल रहा है। अभी यह कहना मुश्किल है कि यह UN को पूरी तरह खत्म कर पाएगा या नहीं।
Q4. कौन से प्रमुख देश इस बोर्ड में शामिल हो चुके हैं?
उत्तर: अब तक इसराइल, सऊदी अरब, मिस्र, तुर्की, अर्जेंटीना, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों ने इसमें रुचि दिखाई है या शामिल होने की सहमति दी है।
Q5. क्या भारत ‘Board of peace’ का सदस्य है?
उत्तर: नहीं, भारत ने अभी तक इस बोर्ड की सदस्यता पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है। भारत सरकार फिलहाल इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर नज़र रख रही है।
Q6. इस बोर्ड का अध्यक्ष कौन है?
उत्तर: डोनाल्ड ट्रंप इस बोर्ड के ‘आजीवन अध्यक्ष’ (Chair for Life) चुने गए हैं। यह पद उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के खत्म होने के बाद भी उनके पास रहेगा।
Q7. ‘गज़ा शांति योजना’ और इस बोर्ड में क्या संबंध है?
उत्तर: बोर्ड का विचार सबसे पहले ट्रंप की ‘गज़ा के लिए 20-सूत्रीय शांति योजना’ से निकला था। अब इसे एक स्थायी अंतरराष्ट्रीय संगठन का रूप दे दिया गया है।
Q8. पश्चिमी देश (जैसे फ्रांस, जर्मनी) इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: यूरोपीय देशों का मानना है कि यह बोर्ड लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, इसमें पारदर्शिता की कमी है और यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की वैश्विक व्यवस्था को कमजोर करता है।
Disclaimer:
इस लेख में दी गई जानकारी वर्तमान अंतरराष्ट्रीय समाचारों और दावोस 2026 के घटनाक्रमों पर आधारित है। ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ के सदस्यों, नीतियों और शुल्क के बारे में जानकारी बदलती परिस्थितियों और आधिकारिक घोषणाओं के अधीन है। हमारा उद्देश्य केवल जानकारी साझा करना है। किसी भी आधिकारिक निर्णय के लिए कृपया संबंधित देशों के विदेश मंत्रालय या आधिकारिक सरकारी वेबसाइटों की जानकारी पर ही भरोसा करें।
